Friday, February 5, 2010

भ्रष्टाचार के भंवर में फंसा विकास का चक्का


शासन में शुचिता महज एक नारा नहीं होना चाहिए। वह अमल में आए और दिखे भी। तभी हम प्रदेश में खुशियाली ला सकते हैं।

हाल ही नई दिल्ली में आठवें अप्रवासी भारतीय सम्मेलन का आयोजन हुआ। सम्मेलन में भाग ले रहे एक अप्रवासी प्रतिनिधि की टिप्पणी ने खासी सुर्खियां बंटोरी, जिसने राजस्थान के प्रशासन और उनके सलूक को लेकर कई सवाल खड़े कर दिए। पिछले कुछ बरसों से दूर देशों में रह रहे भारतवंशियों को अपनी जड़ों से जोडऩे का जो जतन चल रहा था, उसमें इस तरह के भ्रष्टाचार के आरोप अवरोध ही पैदा करेंगे। देश के दो-तीन राज्यों को छोड़ दें, तो निवेश को लेकर अप्रवासियों के उत्साह में किसी तरह का इजाफा होने का तो मतलब ही नहीं। यहां बात केवल राजस्थान के कर्मवीरों की, जो दुनिया के कौने-कौने में ऐसे मुकाम पर पहुंचे, जहां से उनसे उम्मीदें की जा रही हैं कि वे विकास से महरूम इस धरती को अपने स्नेह संबल से सरसब्ज करदें। और यह वाजिब भी है। इसी बहाने इक घटना याद हो आई। मेरे कस्बे के नामी-गिरामी एक व्यक्ति ने मुंबई से नगरपालिका के तत्कालीन चेयरमैन को फोन कर अधीनस्थ अदालत और पशु चिकित्सालय, जो दोनों एक ही परिसर में साथ चलते हैं, के पास पानी और कीचड़ से निजात पाने के लिए एक पार्क विकसित करने की इच्छा प्रकट की। और इसके लिए पूरी धनराशि वो स्वयं वहन करना चाहते थे। लेकिन उनकी एक ही शर्त थी कि पैसा कितना भी लगे, उनके प्रतिनिधि की देखरेख में ही खर्च होगा। जबकि चेयरमैन पैसा अपने पास लेना चाहता था। मंशा जाहिर थी। नतीजतन आज भी उस परिसर के बाहर का मंजर नहीं बदला। ये केवल एक छोटी-सी मिसाल है। हमारे विकास की गाड़ी महज इसीलिए रुकी हुई है। पियन से लेकर प्रिंसीपल सेक्रेटरी और बड़े हाकिमों तक पूरी व्यवस्था में व्याप रहे लोभ के चरित्र को खत्म करने की दरकार है, ताकि भ्रष्टाचार के भंवर में फंसे विकास के चक्के को निकालकर उसे गति दी जा सके।

Thursday, January 7, 2010

सुनो, मां पुकारती है......


एक
बार फिर गौवंश को बचाने की मुहिम। देशभर में विश्वमंगल गौ ग्राम यात्रा जारी है। और इसके जरिए करोड़ों जनमानस में गाय को संरक्षण देने और उसे राष्ट्रीय पशु घोषित करने की पहल नए सिरे से पैदा की जा रही है। आर्ट ऑव लिविंग, गायत्री परिवार, पतंजलि योग पीठ, जैन धर्म के श्वेतांबर, दिगम्बर और तेरापंथ जैसे पंथों के अलावा भारत के विभिन्न संतों, महंतों और सामाजिक कार्यकर्ताओं के समर्थन और सहयोग से चल रही इस अभिनव यात्रा ने एक बार फिर से भारतीय संस्कृति पर विमर्श के लिए लोगों को प्रेरित किया है। यात्रा के पीछे का मकसद कुल मिलाकर गाय और गाय की संस्कृति की पुनस्र्थापना है।


ह।ल ही जब घर जाना हुआ, तो कई दिनों से अधूरी पड़ी मां की तमन्ना पूरी हुई। स्वाभाविक रूप से बड़ी खुशी की बात थी। मौका था गऊ दान का। दूसरे गांव गए, गाय जिस घर में थी वहीं रही, बस नकद भुगतान किया गया, गाय और उसकी साल भर की परवरिश के लिए, और वापस घर के मालिक को, जिसके नाम से संकल्प लिया गया, उसे उसके नुकीले सींगों से बंधी रस्सी के साथ सौंप दिया। मैं मोबाइल पर तस्वीरों को कैद कर रहा था। बच्चों के लिए तो यह परम्परा जैसे कोई खेल की तरह हो गई। कभी गाय के कान में कुछ बोला गया, तो कभी उसकी पूंछ पकड़कर मन वांछित फल मांगा गया। तो कभी उसे और उसके छोटे से बछड़े को तिलक करना और पांवों (खुर) की रज को माथे से लगाना। और कभी उसे चुनरी औढ़ाकर प्रणाम करना। जब संयुक्त परिवार था तो बरसों ही घर में गायों की सेवा-सत्कार को देखा। राठी नस्ल की लक्ष्मी भी उसमें एक थी, जिससे मेरा गहरा लगाव था। शैतानी के तौर पर एक रात के कुछ घंटे उसके ठाण में भी बिताए थे। आते-जाते कितनी ही बार उसे छूते और मस्तक पर लगाते। लेकिन जब सब अलग-अलग हुए, तो सबसे पहले गाज गायों पर ही गिरी, रहने की जगह तंग थी। लक्ष्मी को भी घर से विदा किया गया। और उस समय हमारी आंखों में आंसू थे, और लक्ष्मी के भी। लक्ष्मी के ठाण को कमरे की शक्ल दी गई, जिसमें मैंने कॉलेज तक की पढ़ाई पूरी की। आज भी स्मृतियों के किसी छोर पर लक्ष्मी का चेहरा यक-ब-यक दिख पड़ता है। गाय हमारी माता है, आगे कुछ नहीं आता है और बैल तुम्हारा बाप है, नम्बर देना पाप है जैसी बाल सुलभ उक्तियों के साथ गाय की महत्ता को हम बरसों से कितने ही संस्कारों और परम्पराओं के जरिए देखते-सुनते रहे हैं। कितने ही लोग प्रात: काल गाय के पैरों को छूकर दिन की शुरुआत करते हैं। चर्चा तब होती है जब कोई राजनेता ऐसा करता है। कुछ भी हो, गाय हमारे अन्तस में कहीं गहरे पैठी हुई है और वो अपने तमाम गुणों, सांस्कृतिक परिवेश और जीवन को आरोग्य बनाने की वजह से भी है। तीव्र स्मरण शक्ति के लिए गौ दुग्ध के बारे में तो सुनते आए हैं कि वह इतना तीव्र मेधा वाला होता है कि गाय का बछड़ा हजारों के झुण्ड में भी अपनी मां को पहचान लेता है। जबकि कुछ ही भैंसों के बीच उसका बच्चा उनकी लातें खाते हुए मिलता है। कभी राजा महाराजाओं, जमींदारों और नागरिकों के पास गौवंश संपन्नता का प्रतीक समझा जाता था। विवाह आदि मांगलिक कार्यों में गउएं दी जाती रही हैं। लेकिन आज कितने ही कत्लखानों में वो बेवक्त और बेरहमी से काटी जा रही है। लेकिन सच है कि अब कृष्ण की बांसुरी नहीं बजती। जिस पर हजारों गायें उनके गिर्द-गिर्द मंडरा जाती। तस्वीरों में कृष्ण को गौ रक्षक, गौ-सेवक और गौ-पालक के रूप में दिखाया गया। यानी जहां गाय होगी, वहां सूक्ष्म रूप में कृष्ण भी होंगे। पहली रोटी गाय और अंतिम कुत्ते के लिए रखी जाती रही है। लेकिन सामाजिक-आर्थिक कारणों से गाय पर भी मार पड़ी है। कभी अकाल तो कभी दूसरे कारणों से गौवंश की अनदेखी की जाती रही है।वरिष्ठ संस्कृतिकर्मी नटवरलाल जोशी से जब इस बारे में बात हुई, तो कहने लगे कि जब समुद्र मंथन हुआ तो उससे प्राप्त चौदह रत्न में कामधेनु गाय भी एक थी। इसी की बेटी नंदिनी थी, जो मुनि वशिष्ठ के आश्रम में रही। और इसी की सेवा करके दिलीप ने रघु को प्राप्त किया। भारतीय संस्कृति यज्ञ मूलक है जिसमें यज्ञ संस्कार पंचगव्य अर्थात् गौघृत, गौमूत्र, गौधधि, गौदुग्ध और गौमय के बिना संभव नहीं है। इसी तरह नर्क से मुक्ति पाने और वैतरणी नदी को पार करने के लिए गऊ दान से बेहतर कोई मार्ग नहीं। क्योंकि मृत्यु के बाद पत्नी घर के द्वार तक, पुत्र शमशान यात्रा तक और शरीर चिता में जलने तक साथ देता है। मृत्यु के बाद केवल धर्म ही साथ चलता है। हिन्दू शास्त्रों में पंचबलि का विधान बताया गया है जिसमें क्रमश: गाय, कुत्ता, कौआ, चींटी, मनुष्य या देवता रूप में शामिल हैं। इसकें पीछे धारणा यह है कि हमसे अनजाने में हुए पापों का विमोचन इसके जरिए हो जाता है। आगे जोड़ते हैं कि गऊ ग्रास को श्रद्धा से जिस व्यक्ति के निमित्त दिया जाता है, उसे उसी रूप में पितर प्राप्त करते हैं। मनुष्य रूप में श्रेष्ठ भोजन, पशु रूप में श्रेष्ठ चारा और मांसाहारी जीव के रूप में तद्नुसार भोजन प्राप्त होता है। इसी कड़ी में वृषोत्सर्ग परम्परा भी है जिसमें गाय के बछड़े की सेवा और परवरिश उत्तम गौवंश के लिए की जाती है। मान्यता है कि वृषोत्सर्ग के जरिए ग्यारह पीढिय़ों का उद्धार सुनिश्चित हो जाता है। महाभारत काल से ठीक पहले तक दो गायों को दान देकर लड़की को विदा कर दिया जाता था। गायें दहेज में शामिल थीं और इसे आर्ष विवाह नाम दिया गया।इसी विमर्श में आयुर्वेद विश्वविद्यालय के कुलपति डॉ. बनवारीलाल गौड़ मानते हैं कि शरीर में ओज और बल के लिए गौघृत श्रेष्ठ साधन है तो गौमूत्र यकृत और रक्त विकार में। कैंसर, ह्रदय रोग और मधुमेह जैसी भयंकर बीमारियों में गौ-उत्पाद कारगर साबित हुए हैं। मिरगी के लिए पंचगव्य रामबाण दवा है। संजीवनी वटी गौमूत्र में ही तैयार होती है। वहीं बुखार, आंख-कान, बालों से जुड़े रोगों चर्म विकार में गौ-उत्पादों से तैयार साबुन, शैम्पू और सौंदर्य प्रसाधनों से बाजार तैयार हो रहा है। इस दिशा में निरन्तर शोध हो रहे हैं। लेकिन दु:खद है कि विदेशों में हमारे यहां के ज्ञान और खोजों को पेटेंट किया जा रहा है, तब भी हम नहीं चेत रहे हैं। आयुर्वेद की सैंकड़ों दवाइयों में गौ उत्पादों का प्रयोग हो रहा है और विदेशों में भी उनकी मांग बराबर बढ़ती जा रही है और वहां धूम मचाए हुए हैं। गाय के बिना आयुर्वेद अधूरा है।

Monday, November 16, 2009

कौन बड़ा है! राष्ट्र या महाराष्ट्र?

महाराष्ट्र विधानसभा के भीतर घटी घटना से हर राष्ट्रीय सोच का व्यक्ति आहत है। हो भी क्यों नहीं। आखिर देश की स्वतंत्रता के भार को वहन करने वाली राष्ट्र भाषा हिन्दी के साथ इस तरह का बर्ताव? चिंतनीय और निंदनीय भी। एकबारगी लगा जैसे आजमी को तमाचा मारने वाले कुछ विदेशी भाडे़ के लोग थे, जिन्हें भारत और भारतीयता की कोई परवाह नहीं। तुच्छ स्वार्थों में फंसे कुछ भटके लोगों की घृणित कारगुजारी से यादों में दर्ज इन मराठी माणुसों से एक मुलाकात ताजा हो गई। मुंबई के वाशी रेलवे स्टेशन के नजदीक शिव सेना के मुखपत्र सामना के दफ्तर का एक दृश्य। मौका था सामना में आधुनिक मशीनों की लांचिंग। संजय निरुपम उस समय संपादक हुआ करते। कार्यक्रम में चुनिंदा व्यक्तियों ही प्रवेश। उसी दिन यानी 23 जनवरी को बाल ठाकरे का जन्मदिन भी था ७५वां। मैं अपने एक मित्र के साथ मुंबई प्रवास पर था। और मित्र ने बालासाहब से मुलाकात की इच्छा प्रकट की। थोड़ा आकर्षण मेरे अंदर भी था। मैंने स्वर्गीय विजय लोके (सेना के नेता और मित्र) और माहिम के एमएलए सुरेश गंभीर से बातचीत कर कार्यक्रम में घुसने का रास्ता बनाया। कार्यक्रम में तुरई नाद के साथ ही बालासाहब का प्रवेश और शिवाजी महाराज की जय-जयकार से आसमान गूंज उठा। उस वक्त तक शिव सेना में टूटन नहीं आई थी। मंच पर नारायण राणे के साथ मनोहर जोशी, राज और उद्धव भी थे। बालासाहब मराठी में बोले और उन्होंने हंसाया भी बहुत। बाद में उन्हें बधाई देने जब हम मंच पर पहुंचे, तो मनोहर जोशी ने मेरा परिचय कराया हिन्दी में। स्वयं राज और उद्धव ने मुझसे हिन्दी में ही बात की। बालासाहब ने भी बिना किसी कठिनाई के हिन्दी में संवाद किया। बाद में खाना खाने के दौरान भी सुभाष देसाई और दूसरे लोगों से बात हुई। कहीं भी नहीं लगा कि ये लोग इतने संकीर्ण भी हो सकते हैं, लेकिन सियासत की खातिर हमारे यहां क्या -क्या नहीं होता? सवाल ये है कि क्या राष्ट्र से बड़ा है महाराष्ट्र? क्या कुछ लोगों को उनकी हदों से बाहर जाती निजी महत्वाकांक्षाओं की पूर्ति करने के लिए खुली छूट दी जाती रहेगी? क्या भारत का बाशिंदा अपने ही देश की सरहदों में अपमानित होगा? और सत्ता में बैठे बेशर्म लोग कब तक अपने राजनीतिक हित साधने के लिए मूकदर्शक बने रहेंगे? देश की आत्मा पर चोट करते इन सांस्कृतिक तालिबानियों को रोकना होगा। क्योंकि देश की स्वाधीनता, एकता और अखण्डता के लिए जिन हुतात्माओं ने सर्वस्व दे दिया, उनके उस बलिदान को कलुषित करने का हक किसी भी माणुस को नहीं दिया जाएगा। हाल ही आया सचिन तेंदुलकर का बयान राजटाइप लोगों को बड़ा संदेश देता है कि उन्हें महाराष्ट्रीयन होने का गर्व है, लेकिन मुंबई भारत का एक हिस्सा है, और वे खेलते हैं देश के लिए। यकीनन यही जज्बा हर नागरिक में होना चाहिए। तभी हम बाहरी शçक्तयों की चुनौतियों का मुकाबला कर सकते हैं। अपनी निजताओं को स्वीकारें और उन्हें ताकत बनाते हुए वृहत्तर राष्ट्रहित में समाहित करें। वैसे भी राष्ट्रीय चुनौती और प्रतिष्ठा की कोई भाषा नहीं होती है, भावना होती है और जज्बा होता है। यानी आखिरकार, क्या जयहिंद कहने में जय महाराष्ट्र या जय राजस्थान शामिल नहीं होता?

Wednesday, August 19, 2009

ये सच है या कि कयामत...

ये हैरत की बात है कि टीवी चैनल आपसी गला-काट प्रतिस्पर्धा के चलते अपनी टीआरपी बढ़ाने के लिए जिस तरह के कार्यक्रम गढ रहे हैं, वे हंसते-खेलते लोगों के संसार को उजाड़ रहे हैं।
आजकल बुद्दू बक्से ने कोहराम मचा रखा है, क्योंकि लोगों के जेहन में उठा तूफान शांत होने का नाम ही नहीं ले रहा। स्टार टीवी पर सच का सामना रियलिटी शो में पूछे गए कुछ सवाल भारतीय जनमानस में, खासतौर पर मध्यम और निन मध्यम वर्ग में, परेशानी का सबब बन गए हैं। वे सवाल नश्तर की तरह दापत्य में चुभ रहे हैं और पति-पत्नी के सुखी जीवन में कडवाहट घोल रहे हैं। कहीं पति तो कहीं पत्नी, दोनों ही अपने जीवन साथी को शक की नजर से देख रहे हैं। इसी बहाने कम से कम हमारे समाज की परत दर परत चढ़ती जा रही उस अप-संस्कृति का चीरहरण तो हो रहा है जिस के नाम पर हमने इक झूठा आवरण और आभा-मण्डल बना रखा है और आत्म-मुग्धता की पराकाष्ठा पर आ पहुंचे हैं। लेकिन देखने वाली बात यह है इस कीचड़ को हम क्यों इतना ऊंचा उछाल रहे हैं। आखिर वह गिरना तो नीचे ही है। कुछ ही असेü पहले मैं दिल्ली प्रवास पर था और इंडिया टीवी पर एक कार्यक्रम देख रहा था तभी रजत शर्मा की अपील भी सुनने को मिली जिसमें वे कहते हैं कि लोगों की निजी जिंदगी में तांक-झांक करना या कास्टिंग काउच जैसी चीजों को लेकर ही प्रसारण करना उनका काम नहीं है। और वे जिमेदार चैनल की हैसियत से ही खबरों का चयन और प्रसारण करेंगे। इशारा साफ था अमन वर्मा, शçक्त कपूर और इसी तरह के कुछ दूसरे नामचीन लोगों की कारगुजारियों पर से परदा उठाना वगैरह-वगैरह। चाहे सनसनीखेज खबरों के लिए एकबारगी टीवी की टीआरपी क्यूं न बढती हो, पर ये तय है कि उसकी साख लगातार गिरेगी जरूर। लेकिन यहां बात लोगों की जिंदगी के अंदरूनी और स्याह सच को सामने लाने की बात हो रही है।
मेरे एक मित्र के ब्लॉग पर एक पंçक्त को पढ़कर मेरे पसीने आ गए, जिसमें लिखा था- मैं कसम खाकर कहता हूं कि इस ब्लॉग पर जो लिखूंगा, सच लिखूंगा। सच के सिवा कुछ भी नहीं। मैंने उसे ईमेल तुरत मारी और जिसमें कहा- पापे, तुझे हो क्या गया है.. बौरा गया है तू। क्या सच बोलना चाहता है, बता? और तेरे इस तरह से सच बोलने से न समाज का कुछ भला होने वाला है और न तेरा। क्यों तू अपनी गिरस्थी को आग लगाने पर तुला है। तुझे नहीं मालूम कि ये टीवी पर चमकते हुए चेहरे हमारी पारिवारिक नींव को ही हिला देंगे। और इनका कुछ नहीं बिगडना। ये रईसजादे पैसों के लिए कुछ भी करेंगे। और कल तक चंद पैसों के लिए काम करने वाले कहां के सेलिब्रिटी हो गए। ये सब इलेक्ट्रोनिक माडिया की पैदा की हुई नाजायज औलादें हैं जो रातों-रात करोड़ों में खेलना चाहते हैं और वह भी किसी कीमत पर क्यों न हो। फिल्मी माहौल में पल रही ये पीढ़ी पश्चिम के सारे संस्कारों से युक्त और विशुध्द भारतीयता से मुक्त है। इन्हीं होनहारों की बदौलत हाल ही में एक सवेü में यह पाया गया कि विवाहेत्तर और विवाह से पूर्व किसी भी तरह के शारीरिक संबंधों का आंकडा 42 फीसदी तक पहुंच गया है। अब ये अपने आप मेें विवाद का विषय हो सकता है कि सवेü एजेन्सी ने शामिल किए गए लोगों का आधार क्या रखा।
इसी से जुड़े हालिया दो बडे़ काण्ड सुर्खियों में छाए। सच का सामना कार्यक्रम की तर्ज पर ही दो दपत्तियों ने इसी तरह की निरी मूखüता को अंजाम दिया और देखते-देखते दो घरों की खुशियां राख हो गई। ऐसे ही खेल-खेल में पति-पत्नी में सवालों का सिलसिला शुरू हुआ तो सवाल निकला कि शादी से पहले पत्नी के किसी मदü से शारीरिक सबंध थे या नहीं। और जोश-जोश में पत्नी ने जब बताया कि उसके पहले भी किसी के साथ अंतरंग रिश्ते रहे हैं तो पति अवाक रह गया और सद्मे में आ गया। इसी सद्में में उसने खुदकुशी करली। एक और मामले में इसी तरह की बात जब पति पत्नी में हो रही थी तो पत्नी विजेता के अंदाज में बोली कि उनके दो बेटों में एक उनका नहीं है यानी गैर मदü का है। इतना सुनना भर था कि पति ने धारधार ब्लेड से पत्नी को हलाक कर दिया। हालांकि इन दोनों उदाहरणों से हम यह नहीं स्थापित करना चाहते कि महिलाएं ज्यादा वफादार होती हैं या पुरुष, बल्कि इसका मंतव्य सीधे तौर पर बेलगाम हो रहे टेलीविजन चैनलों की मंशा और नई स्थापित की जा रही संस्कृति और मूल्यों की ओर ध्यानाकर्षण करना ही है जो दबे स्वर में भारतीय परपराओं और हमारी विवाह संस्था को तबाह करने पर तुले हैं। इसीलिए याद आती है स्कूल के जमाने में पढ़ी पाठ्य-पुस्तक की वह सूçक्त, जो सच बोलने के साथ खास हिदायत भी देती है। संस्कृत में सूçक्त है- सत्यम ब्रूयात प्रियम ब्रूयात, न ब्रूयात सत्यम अप्रियम। अरथात सत्य बोलो, प्यारा बोलो मगर कभी अप्रिय लगने वाला सत्य न बोलो।

Saturday, July 18, 2009

ये अन्दर की बात है...

पिछले दिनों राजस्थान की विधानसभा में जो कुछ हुआ, वह जनप्रतिनिधिओं के असली चेहरे को उजागर करता है।अच्छा है इसी बहाने एक बार फिर निजी बनाम सार्वजनिक जीवन की बहस फिर छिडी है. कितनी ही उम्मीदों को लेकर जनता अपने वोट का इस्तेमाल कर इन महान प्रतिनिधिओं को विधानसभा और लोक सभा की देहलीज़ तक पहूँचाती है मगर अफसोस, हर बार उसे लगता है कि वे खुद इस्तेमाल हुयें है. और वो इमोशनल ब्लेकमेल के जरिये. कभी जात-बिरादरी तो कभी धर्मं, तो कभी क्षेत्र और इस से भी पार न पड़े तो फिर वादों की बरसात. आखिर जनता करे तो भी क्या? विश्वास करना ही पड़ता है और क्या विकल्प बचता है. यानी किसी न किसी को तो वोट करना ही है. आखिर सिस्टम में तो कोई न कोई पहूंचेगा ही. खैर, बात विधानसभा के अन्दर की है. और जब बात अन्दर की हो तो बाहर की बेताबी बढ़ जाती है. हमारे विधायक कई बार अपने जलवे दिखा चुके है, कि वे कितने काबिल, समझदार और सभ्य हैं. और सार्वजनिक शुचिता के लिए कितने गंभीर है.
पहले बात अपने अमिताभ भैया के बदतर, माफ़ कीजिये बेहतर और दमदार उत्तरप्रदेश की, आपको याद ही होगा की विधायकों ने एक दुसरे के साथ न केवल हाथापाई की वरन हिंसक वारदात भी की. सब ने कहा कि सदन की गरिमा लज्जित हुई. लेकिन विधायकों को कहीं से नहीं लगा कि कुछ तो ऐसा हुआ है कि जो सिर को झुका देता है. बात आई गई हो गई. अब बात राजस्थान की विधानसभा की. पक्ष और विपक्ष दोनों तरफ़ से बेशर्मी और बेहयाई का बेहतरीन मुजाहिरा.चरित्र को लेकर लांछन। ये कितने सही हैं या गलत, ये तो बाद की बात है, पर हैं गंभीर और निंदनीय. इसमें शराब पीने, पीने के बाद मदहोश होने, और मदहोशी में होने वाली मस्ती की तरफ भी इशारा है. एक पूर्व महिला मुख्यमंत्री को निशाने पर लेकर कहा गया- आफ्टर ८ पी एम् नो सी एम्. इसके बाद तो बस आरोप और प्रत्यारोप का दौर. इसका भावः यह कि ८ बजे बाद मुख्यमंत्री नाम की कोई चीज़ नहीं होती थी. दूसरा आरोप यूएस, लन्दन, देहरादून में की जाने वाली मौज मस्ती को लेकर. यानी वसुंधरा राजे जो घोषित रूप में तलाकशुदा है, उन पर इस तरह की टिप्पणी सीधे तौर पर चरित्र हनन का मामला. ऐसा कहने की देर थी मोहतरमा भी बरसी एक विधायक पर की पत्नी की शान में कसीदे पढ़कर. याद आता हैं अमेरिका के राष्ट्रपति क्लिंटन की, मोनिका की, उनके अमर प्रेम की. क्लिंटन को आखिर खून के आँसू रोना पड़ा. सवाल है कि सार्वजनिक जीवन में छोटे और बड़े ओहदों पर बैठे लोगों का जीवन कुछ अंशों में भी निजी हो सकता है या नहीं? वैसे मेरे दिल की बात तो यह है कि जब आखों का पानी ही ख़त्म हो गया है तो हया कैसी, शर्म कैसी. सब कुछ खुला खुला-सा है तो लिबास कैसा. वैसे एक और अत्याचार है, और वोह है इनके विशेषाधिकारों का. मतलब वो जहान की बात करे और जहान अपने होठों पर पट्टी बांध ले.

Monday, July 6, 2009

जरूरी हैं जज्बात

बदलावों के लिए हमें हमेंशा तैयार रहना चाहिए. और बदलाव अक्सर ख़ूबसूरत होते हैं. कई बार नहीं भी होतें मगर यही तो इक चीज़ है जो स्थाई है. अपने बारे में कई बार सोचता हूँ तो लगता है जैसे जिंदगी बदल गई है पूरी तरह. और बदली भी कुछ इस तरह से है की यकीन नहीं होता. इसी तरह की बहुत सारी चीजें हैं जो रोज़-रोज़ ज़हन में आती है और कभी दिल को गुदगुदाती हैं तो कभी जज्बाती बना देती हैं. कई बार सोचता हूँ की गर जज्बात नहीं होतें तो जिंदगी कैसी होती. जज्बात से ही बात बनती है और बनती है मुकम्मल जिंदगी. इसे जारी रखूंगा इक ब्रेक के बाद.

Wednesday, July 1, 2009

तालीम नहीं डिगि्रयां बांटते हैं हम



निजी क्षेत्र उच्च शिक्षा में अनगिनत नए पाठ्यक्रम ला रहे हैं, लेकिन सेवा से जुड़ा यह काम अब पूरी तौर पर व्यावसायिकता की गिरफ्त में आने के बाद बाकायदा धंधा बना दिया गया है। जाहिर है कि अब इसमें शराब और कुछ दूसरे किस्म का धंधा करने वाले लोग भी आ चुके हैं। एक काउण्टर से शराब बेचते हैं, तो दूसरे से शिक्षा। अच्छी जुगलबंदी है। अगर यहां केवल शिक्षक-प्रशिक्षण संस्थानों की बात की जाए, तो हालिया एक घटना बहुत बेचैन करने वाली है। एक निजी विश्वविद्यालय के कुलाधिपति (चांसलर) के खिलाफ धोखाधड़ी को लेकर एक छात्रा के अभिभावकों ने प्राथमिकी दर्ज करवाई। जिसके बाद से कुलाधिपति महोदय को जेल की सलाखों के पीछे भेज दिया गया। शैक्षणिक व्यवस्था पर फिर एक सवालिया निशान। बीएड पाठ्यक्रम में दाखिला लेने वाली उक्त छात्रा का आरोप है कि पाठ्यक्रम की मान्यता को लेकर उन्हें अंधेरे में रखा गया और इस तरह से उसका पूरा साल दांव पर लग गया और फीस जो गई, सो अलग। आज कुछ डिगि्रयों को लेकर जो युवाओं में जुनून है, वो कुछ हद तक रोजगार की समस्या से जुड़ा है। इसलिए हर साल हजारों की संख्या में राज्य से बाहर के कुछ संस्थानों से यहां के विद्यार्थी बीएड करते रहे हैं। ये संस्थान बरसों से बड़ी तादाद में बीएड डिग्रीधारियों को तैयार करने में मोटी चांदी काट रहे हैं। इसमें खास बात ये है कि आपको वहां साल भर रुकने की कतई जरूरत नहीं है, बस सुविधा शुल्क अदा कर दीजिए। सीधे तौर पर कहा जाए तो यह डिगि्रयों को बेचने जैसा है। यही शायद वह वजह रही होगी कि राज्य सरकार ने यहां भी बड़ी संख्या में बीएड कॉलेज खोल डाले। चाहें वे शिक्षा के मानकों पर खरे नहीं उतरते हों। राज्य में शिक्षा के इतने संस्थान खुलना सुखद है लेकिन ये बात भी दिल को कचोटती है, जब हमें मालूम होता है कि इन संस्थानों में हो क्या रहा है। वास्तव में ये सारे संस्थान धीरे-धीरे खुले विश्वविद्यालय के ऑव कैम्पस सेण्टर में तब्दील हो रहे हैं, जहां पढ़ाई के अलावा सभी कुछ पूरी गंभीरता से चलता है। बस आप एक और फीस दे दीजिए, पहली दाखिला लेने की तो आप काउंसलिंग के वक्त दे चुके होते हैं और दूसरी फीस होगी आपके नियमित या बिल्कुल भी नहीं आने की। क्यों हैं न एक अच्छी बात? और फिर इन संस्थानों के पास तो पर्याप्त योग्य शिक्षक भी नहीं हैं। अब सवाल ये है कि सरकार इन खरपतवार की तरह उग आए शैक्षणिक संस्थानों की निगरानी का काम कैसे करे? मानव संसाधन मंत्री कपिल सिब्बल का बिल्कुल ताजा बयान इस सारी स्थितियों में उम्मीद तो जगाता है, जिसमें उन्होंने शैक्षणिक कदाचार को रोकने और उच्च शिक्षा में विद्यार्थियों से झूठ बोलकर धन उगाही करने वाले संस्थानों पर लगाम लगाने और इसके लिए कानून बनाने का इरादा जताया। यकीनन अभी नहीं, तो कभी नहीं वाली स्थिति आ चुकी है, लिहाजा सरकार की ओर से ऐसी ठोस पहल होनी चाहिए जिसमें तंत्र की बुनियादी खामी का फायदा उठाकर शुरु होने वाले संस्थानों की समीक्षा हो, उन्हें तत्काल या तो तय मानकों और नियमों में जारी रखने की बाध्यता करें या फिर आंशिक नहीं, पूरी तरह उनकी मान्यता खारिज करें। वरना हमारे प्रदेश की डिगि्रयों की दुर्गति होते देखने के लिए हमें तैयार रहना चाहिए।